गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

Sab Kahan Kuchh Lala-o-Gul Mein Numaayan Ho Gayin


Sab Kahan-kuch Lala-o-gul Mein Numaayan Ho Gayee
Khaak Mein Kya Suraten Hongi Ke Pinhan Ho Gayee

Ranz Se Khu-garz Hua Insaan To Mit Jaata Hai Ranz
Mushkilyen Mujh Par Padi Itnee Ke Aasaan Ho Gayee

Yun Hi Gar Rota Raha 'ghalib' To E-ehle Jahaan
Dekhna In Bastiyon Ko Tum Ke Weeraan Ho Gayee
Album: Mirza Ghalib
Singers: Jagjit Singh
Lyricist: Mirza Ghalib
सब कहाँ? कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायां हो गईं;
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हां हो गईं!

याद थी हमको भी रंगा-रंग बज़्मआराइयां;
लेकिन अब नक़्श-ओ-निगार-ए-ताक़-ए-निसियां हो गईं!

थीं बनातुन्नाश-ए-गर्दूँ दिन को पर्दे में निहां;
शब को उनके जी में क्या आई कि उरियां हो गईं!

क़ैद से याक़ूब ने ली गो न यूसुफ़ की ख़बर;
लेकिन आँखें रौज़न-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँहो गईं!

सब रक़ीबों से हों नाख़ुश, पर ज़नान-ए-मिस्र से;
हैं ज़ुलेख़ा ख़ुश कि सहबे-माह-ए-कनआं हो गईं!

जू-ए-ख़ूँ आँखों से बहने दो कि है शाम-ए-फ़िराक़;
मैं ये समझूँगा के दो शम्अ़एं फ़रोज़ा हो गईं!

इन परीज़ादों से लेंगे ख़ुल्द में हम इन्तक़ाम;
क़ुदरत-ए-हक़ से यही हूरें अगर वाँ हो गईं!

नींद उसकी है, दिमाग़ उसका है, रातें उसकी हैं;
तेरी ज़ुल्फ़ें जिसके बाज़ू पर परीशां हो गईं!

मैं चमन में क्या गया, गोया दबिस्तां खुल गया;
बुलबुलें सुन कर मेरे नाले, ग़ज़लख़्वां हो गईं!

वो निगाहें क्यों हुई जाती हैं यारब दिल के पार;
जो मेरी कोताही-ए-क़िस्मत से मिज़गां हो गईं!

बस कि रोका मैंने और सीने में उभरीं पै-ब-पै;
मेरी आहें बख़िया-ए-चाक-ए-गरीबां हो गईं!

वां गया भी मैं, तो उनकी गालियों का क्या जवाब?
याद थीं जितनी दुआयें, सर्फ़-ए-दरबां हो गईं!

जां-फ़िज़ां है बादा, जिसके हाथ में जाम आ गया;
सब लकीरें हाथ की गोया रग-ए-जां हो गईं!

हम मुवहि्हद हैं, हमारा केश है तर्क-ए-रूसूम;
मिल्लतें जब मिट गईं, अज़्ज़ा-ए-ईमां हो गईं!

रंज से ख़ूगर हुआ इन्सां तो मिट जाता है रंज;
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं!

यूँ ही गर रोता रहा "ग़ालिब", तो ऐ अह्ल-ए-जहां!
देखना इन बस्तियों को तुम, कि वीरां हो गईं!
एल्बम: मिर्ज़ा ग़ालिब
गायक: जगजीत सिंह
शायर: मिर्ज़ा ग़ालिब
Watch/Listen on youtube: Pictorial Presentation