गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

Zulmat Kade Mein Mere Shab-e-gham Ka Josh Hai


Zulmat_kade Mein Mere Shab-e-gham Ka Josh Hai
Ik Shamma'a Hai Daleel-e-sahar, So Khamosh Hai

Daagh-e-firaaq-e-sohabat-e-shab Kee Jalee Hooee
Ik Shamma`a Reh Gaee Hai So Wo Bhee Khamosh Hai

Aate Hain Ghaib Se Ye Mazaameen Khayaal Mein
'Ghalib', Sareer-e-khaama Nawa-e-sarosh Hai
Album: Mirza Ghalib
Singers: Jagjit Singh
Lyricist: Mirza Ghalib
ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है;
इक शम्अ है दलील-ए-सहर सो ख़मोश है!

ने मुज़्दा-ए-विसाल न नज़्ज़ारा-ए-जमाल;
मुद्दत हुई कि आश्ती-ए-चश्म-ओ-गोश है!

मय ने किया है हुस्न-ए-ख़ुद-आरा को बे-हिजाब;
ऐ शौक़! हाँ इजाज़त-ए-तस्लीम-ए-होश है!

गौहर को अक़्द-ए-गर्दन-ए-ख़ूबाँ में देखना;
क्या औज पर सितारा-ए-गौहर-फ़रोश है!

दीदार बादा हौसला साक़ी निगाह मस्त;
बज़्म-ए-ख़याल मय-कदा-ए-बे-ख़रोश है!

ऐ ताज़ा वारदान-ए-बिसात-ए-हवा-ए-दिल;
ज़िन्हार अगर तुम्हें हवस-ए-नाए-ओ-नोश है!

देखो मुझे जो दीदा-ए-इबरत-निगाह हो;
मेरी सुनो जो गोश-ए-नसीहत-नेओश है!

साक़ी-ब-जल्वा दुश्मन-ए-ईमान-ओ-आगही;
मुतरिब ब-नग़्मा रहज़न-ए-तम्कीन-ओ-होश है!

या शब को देखते थे कि हर गोशा-ए-बिसात;
दामान-ए-बाग़बान ओ कफ़-ए-गुल-फ़रोश है!

लुफ़्त-ए-ख़िरम-ए-साक़ी ओ ज़ौक़-ए-सदा-ए-चंग;
ये जन्नत-ए-निगाह वो फ़िरदौस-ए-गोश है!

या सुब्ह-दम जो देखिए आ कर तो बज़्म में;
ने वो सुरूर ओ सोज़ न जोश-ओ-ख़रोश है!

दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई;
इक शम्अ रह गई है सो वो भी ख़मोश है!

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में;
'ग़ालिब' सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है!
एल्बम: मिर्ज़ा ग़ालिब
गायक: जगजीत सिंह
शायर: मिर्ज़ा ग़ालिब
Watch/Listen on YouTube: Pictorial Presentation